'छिंदवाड़ा अंचल के मेले , chhindwara के मेले , chhindwara में होने वाले मेले
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छिंदवाड़ा अंचल के मेले , "chhindwara के मेले , "बेरडी का मेला ""बेरडी की दाहिलाही " " बेरडी विट्ठल मंदिर "
रामाकोना का मेला , "पांढुर्णा का गोटमार मेला " "गोटमार मेला "
ग्राम बेरडी में आयोजित दाहिलाही ,
सम्पूर्ण जिल्हे("छिंदवाड़ा ") में सबसे बड़ा आयोजन ग्राम बेरडी तह. सौसर जिल्हा छिंदवाड़ा में आयोजित किया जाता है , यहाँ की मान्यता के अनुसार विट्ठल रुखमामाई की बड़ी अदभुत मूर्ति स्थापित है , द्वितीय मान्यता है की पंढरपुर से भगवान मात्र 7 दिनों के लिए ग्राम बेरडी में आते है , यहाँ ग्राम में सभी ग्रामवासीयो का 7 दिन महोत्सव चलता है।
यह महोत्सव दसहरा के पश्चात सुरु किया जाता है , जिसमे भगवांन के समक्ष 7 दिनों तक अर्थात 168 घंटे बिना रुके परकम्मा लगाया जाता है , 7 दिन के पश्चात सबसे बड़ा महोत्सव दाहिलाही का आयोजन किया जाता है। जिसमे महाराष्ट्र तथा मध्यप्रदेश के श्रद्धालु लाखो की तादात में उमड़ते है , पुरे ग्राम में आये हुए श्रदालु को नास्ता , चाय , फल तथा जगह जगह पर भंडारा होता है , यहाँ ग्राम में अखंड हरिनाम सप्ताह का आयोजन किया है। आये श्रद्धालुओं पर पुष्प वर्षा कराइ जाती है।
यही सब ग्राम बेरडी में आयोजित दाहिलाही को सम्पन्न बनाती है।
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पांढुर्णा का गोटमार मेला
"छिंदवाड़ा" नगर में 65 मील दूर पांढुर्णा में यह अपने तरह का मेला हिंदी के भाद्रपद महीने की दूसरी तिथि पर प्रतिवर्ष आयोजित होता है। यह मेला जाम नदी के किनारे पर लगता है। जाम नदी के बीच में एक वृक्ष को झंडा लगा कर स्थापित किया जाता है। इसके बाद पांढुर्णा के नगरवासी नदी के एक ओर तथा दूसरी ओर सावरगाव के रहवासी एकत्र होते है। ये लोग अपने आस पास पत्थरो से एक दूसरे पर प्रहार करते है। इन दोनों तरफ के लोगो का यह प्रयास होता है की नदी के बीच स्थापित किये गए वृक्ष के ऊपर लगा झंडा प्राप्त कर लिया जाये। इस बीच पत्थरो का बरसना जारी रहता है। झंडे को जिस और के लोग ला पाते है , उन्हें विजयी मना है।
इस पुरे कार्यक्रम के नारे गूंजते रहते है। यदि इस बीच कई लोग दुर्घटना ग्रस्त हो जाते है तो लोग इसे अपनी परिपाटी तथा यहाँ की जनश्रुति के अनुरूप इसे मानते है। शासन द्वारा इस मेले के लिए बहोत से इंतजाम किये जाते है।
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भाण्डा देव
"छिंदवाड़ा" के रोहना ग्राम के समीप ही हीरावाडी ग्राम के पास एक बहुत बड़ी शिला छोटे छोटे से पत्थर के उपर जमी हुई हैं। इस शिला को ही लोग भाण्डा देव के नाम से पूजते हैं। यहा चैत्र के मास मे मेला लगता हैं।
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राधादेवी की गुफ़ा
यद्दपि यह स्थान राधादेवी की गुफ़ा के नाम से जाना जाता हैं, परंतु सिल्लेवानी पर्वत शृंखला के रमाकोना ग्राम से 10 मील पहले सुरम्य पहाड़ी मे एक गुफ़ा मे शिवाजी का लिंग स्थित हैं। यहा प्रत्येक शिवरात्रि को मेला लगता हैं प्राकृतिक रूप से इस स्थान की छटा बड़ी मनोहारी हैं।
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सालीवाड़ा शारदादेवी
अमरवाड़ा (छिंदवाड़ा )के पूर्व में चौरई मार्ग में लगभग 4 मील दूर एक ऊची टेकड़ी पर शारदा देवी की प्रभावशाली प्रतिमा स्थापित है। यहाँ चैत्रमास के नवरात्र पर बड़ा मेला भरता है। यह साधको के लिए बड़ा उपयुक्त स्थान है। यहाँ प्राकृतिक शांति बड़ी अदभुत है।
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रामाकोना का षष्टी मेला
छिंदवाड़ा के नागपुर रोड पर कन्हान नदी के उत्तर किनारे पर रामाकोना ग्राम में विक्रमी सम्वत के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष षष्टी के दिन मेला लगा करता है। यह बहुत विशाल मेला होता है। यहाँ लोग यह उत्सव हरिकीर्तन सप्ता करते हुए हप्ते भर तक मानते है।
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pहादेव का मेला :
यह मेला छिंदवाड़ा नगर की पश्चिमी सीमा पर पूर्व अल्मोद जागीर ाव पचपेढ़ी के बीच चौरागढ़ शिखर की यात्रा का मेला है। इस मेले का उल्लेख गजेटियर में है , किन्तु कितने प्राचीन समय से लग रहा है , निश्चित से बताना संभव नहीं है। छिंदवाड़ा - पिपरिया मार्ग पर कुआँ बादला से लोग यात्रा प्रारम्भ करते है। यह विशाल मेला फाल्गुन माह की कृष्ण चतुर्दशी से प्रारम्भ हो जाता है। शिवरात्रि से दो तीन दिन पूर्व तथा बाद तक यह मेला चलता रहता है। इस मेले में महाराष्ट्र राज्य से बहुटी बड़ी संख्या में लोग बसों तथा अपने वहां से पहुंचते है। चौरागढ़ की पर्वतीय श्रृंखला महादेव के जयकारो से गुंजायमान रहती है। शासन की तरफ से सुचारु व्यवस्था बनाये रखने के बहुत अच्छे इंतजाम किये जाते है।
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नागद्वारी मेला :-
यह स्थान भी चौरागढ़ शिखर से दस पंद्रह मील के अंतर में बसा है।
पहले लोग जुन्नारदेव से पैदल यहाँ पहुंचते थे किन्तु अब यातायात साधन उपलब्ध है। यह मेला श्रवण माह के शुल्क पंचमी को तथा रक्षाबंधन के पर्व पर लगता है। इन पर्वत श्रेणियों के बिच वर्षा के कारण यह यात्रा कस्टप्रद तो लगती है , किन्तु बहुत बड़ी संख्या में लोग जिसमे महाराष्ट्र राज्य से आये श्रद्धालु भी होते है , बड़ी आस्था से इस यात्रा को सम्पन्न करते है। यहाँ एक बड़ी विशाल गुफा वर्षा यात्रियों का आश्रय स्थली बन जाती है।
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नेर जमुनिया का मेला :-
यह मेला फाल्गुन माह की कृष्ण चतुर्दशी को लगता है , नरसिंगपुर मार्ग पर छिंदवाड़ा से आठ नौ मील दूर एक प्राचीन शिव मंदिर है। इस मेले में आस पास के ग्रामवासी बड़ी संख्या में शिवदर्शन को आते है।
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कलिरात का मेला :-
यह मेला कार्तिक पूर्णिमा के दिन से प्रारम्भ होता है। छिंदवाड़ा से मात्र छः मील दूर नागपुर मार्ग पर स्थित लिंगा ग्राम के पूर्व कुलबहरा नदी के किनारे यह मेला लगता है। यह मेला पंद्रह दिन लगता है , जिससे आस पास के व्यापारी अपनी दुकान लगाते है। बड़ी संख्या में ग्रामवासी इस मेले में आते है। मेले में मनोरंजन के जुले इत्यादि भी लगते है।
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